मेवाड़ की शाही सवारी और चेतक का प्रतीकात्मक गौरव | Mewar History

मेवाड़ की शाही सवारी और चेतक का प्रतीकात्मक गौरव जानिए। श्यामल दास के वर्णन अनुसार यह परंपरा शौर्य, बलिदान और राजसी अनुशासन का प्रतीक थी।

मेवाड़ की शाही सवारी और चेतक का प्रतीकात्मक गौरव | Mewar History

मेवाड़ की शाही सवारी और चेतक का प्रतीकात्मक गौरव: जब परंपरा बनी शक्ति का संदेश

उदयपुर।
मेवाड़ की धरती केवल किलों और युद्धों की नहीं, बल्कि उन परंपराओं की भी साक्षी रही है, जिन्होंने शौर्य, स्वामिभक्ति और बलिदान को प्रतीकों के माध्यम से अमर कर दिया। इन्हीं परंपराओं में चेतक का नाम विशेष महत्व रखता है। चेतक मेवाड़ के लिए केवल एक वीर घोड़ा नहीं था, बल्कि वह त्याग, निष्ठा और आत्मबलिदान का ऐसा प्रतीक बन गया, जिसे पीढ़ियों तक जीवित रखा गया।

इतिहासकार श्यामल दास के ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि दशहरा और शरद पूर्णिमा के मध्य मेवाड़ में एक विशेष शाही सवारी का आयोजन किया जाता था। यह सवारी साधारण सैन्य निरीक्षण नहीं, बल्कि मेवाड़ की सामरिक शक्ति, राजसी अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ करती थी। इस आयोजन के माध्यम से राज्य की सैन्य सजगता और परंपरागत गौरव को जनता के सामने प्रस्तुत किया जाता था।

शाही सवारी की तैयारी अत्यंत विधिपूर्वक की जाती थी। चयनित घोड़े को विशेष रूप से सजाया जाता और उसके मुख पर प्रतीकात्मक बनावटी सूंड लगाई जाती थी, जिसे गज-बल, शक्ति और विजय का संकेत माना जाता था। यह प्रतीक इस बात का संदेश देता था कि मेवाड़ की शक्ति केवल शस्त्रों या सेनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी जड़ें परंपरा, प्रतीकों और सामूहिक स्मृति में भी गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इस सवारी में महाराणा साहिब स्वयं पूर्ण फ़ौजी वेश में सम्मिलित होते थे। सिर पर युद्धकालीन शिरस्त्राण, शरीर पर कवच, हाथों में शस्त्र और साथ में कुल सर्दार, अधिकारी व पासबान—यह दृश्य मेवाड़ की सैन्य गरिमा और अनुशासन का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता था। शाही सवारी महलों से प्रारंभ होकर दिल्ली दरवाज़े से नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरती हुई सारणेश्वरगढ़ के समीप पहुंचती थी, जहां फ़ौज और तोपखाने की विधिवत हाज़िरी ली जाती थी।

इस भव्य आयोजन को देखने के लिए केवल मेवाड़ के नागरिक ही नहीं, बल्कि दूर-दराज़ के क्षेत्रों से लोग उदयपुर पहुंचते थे। अंग्रेज़ अधिकारी और विदेशी अतिथि भी इस शाही सवारी के साक्षी बनते थे, जिससे यह आयोजन मेवाड़ की सैन्य परंपरा और राजसी वैभव का अंतरराष्ट्रीय परिचय बन गया।

शाही सवारी का उद्देश्य केवल दृश्य वैभव नहीं था। इसके माध्यम से जनता को यह स्पष्ट संदेश दिया जाता था कि मेवाड़ की शक्ति सदैव सजग है, उसकी परंपराएं जीवित हैं और उसका इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जनमानस की स्मृति में आज भी सांस ले रहा है। चेतक का नाम और उसका प्रतीक इस बात का प्रमाण है कि बलिदान कभी समाप्त नहीं होता—वह परंपरा बनकर युगों तक जीवित रहता है।