राजस्थान साहित्य अकादमी का 68वां स्थापना दिवस, साहित्य की चुनौतियों पर हुआ मंथन

उदयपुर में राजस्थान साहित्य अकादमी का 68वां स्थापना दिवस मनाया गया। ‘साहित्य में चुनौतियाँ और अकादमी’ विषय पर संगोष्ठी, पुस्तक व कला प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रहीं।

राजस्थान साहित्य अकादमी का 68वां स्थापना दिवस, साहित्य की चुनौतियों पर हुआ मंथन

राजस्थान साहित्य अकादमी का 68वां स्थापना दिवस मनाया गया

‘साहित्य में चुनौतियाँ और अकादमी’ विषय पर हुआ विचार-मंथन, पुस्तक व कला प्रदर्शनी बनी आकर्षण का केंद्र

उदयपुर, 28 जनवरी।
राजस्थान साहित्य अकादमी का 68वां स्थापना दिवस बुधवार को अकादमी के मुख्य सभागार में गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया। इस अवसर पर साहित्यिक संगोष्ठी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, पुस्तक एवं कला प्रदर्शनी जैसे विविध कार्यक्रम आयोजित हुए, जिन्होंने समारोह को विशेष बना दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता संभागीय आयुक्त प्रज्ञा केवलरमानी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में अखिल भारतीय साहित्य परिषद, चित्तौड़ प्रांत अध्यक्ष विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में जिला शिक्षा अधिकारी लोकेश भारती एवं प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. गायत्री तिवारी शामिल रहीं। 

समारोह का केंद्रीय विषय ‘साहित्य में चुनौतियाँ और अकादमी’ रहा, जिस पर वक्ताओं ने गंभीरता से विचार रखे। वक्ताओं ने डिजिटल युग में पाठकों की घटती रुचि, बाजारवाद का प्रभाव, प्रकाशन से जुड़ी आर्थिक समस्याएं, भाषाई विविधता के संरक्षण और युवा पीढ़ी में साहित्यिक चेतना के अभाव जैसी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही इन चुनौतियों से निपटने में राजस्थान साहित्य अकादमी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।

अकादमी सचिव डॉ. बसंत सिंह सोलंकी ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना 28 जनवरी 1958 को हुई थी और पिछले 68 वर्षों से यह संस्था राज्य की साहित्यिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभा रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अकादमी को डिजिटल माध्यमों का अधिक प्रभावी उपयोग करते हुए हिंदी, राजस्थानी और अन्य लोक भाषाओं के साहित्य को वैश्विक मंच तक पहुंचाना होगा।

मुख्य अतिथि विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, लेकिन आज बाजारवाद और सोशल मीडिया की तेज़ रफ्तार ने साहित्य की गहराई को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम है और अकादमी जैसी संस्थाएं इस भूमिका को मजबूती दे सकती हैं। उन्होंने राजस्थान की समृद्ध लोक-साहित्य परंपरा को आधुनिक संदर्भों में जीवित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्ष प्रज्ञा केवलरमानी ने कहा कि साहित्य संस्कृति, मूल्यों और भावनाओं का संवाहक है। चुनौतियों के दौर में भी अकादमी को साहित्यकारों को निर्भीक अभिव्यक्ति का मंच उपलब्ध कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार और अकादमी मिलकर युवा लेखकों को प्रोत्साहित करें, तो राजस्थान का साहित्य नई ऊंचाइयों को छू सकता है।

विशिष्ट अतिथि प्रो. गायत्री तिवारी ने शिक्षा और साहित्य के परस्पर संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डिजिटल विचलन और भाषा के क्षरण जैसी चुनौतियों के बावजूद अकादमी शैक्षणिक संस्थानों से जुड़कर युवाओं में साहित्यिक चेतना जगा सकती है। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी लोकेश भारती ने कहा कि शिक्षा विभाग साहित्य को शिक्षा का अभिन्न अंग मानता है और अकादमी के साथ मिलकर छात्र-शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। 

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शारदा पोटा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में विशेष रंग भरा। डॉ. शारदा भट्ट द्वारा सरस्वती वंदना से समारोह की शुरुआत हुई। शैली श्रीवास्तव एवं उनकी टीम की ओडिसी नृत्य प्रस्तुति को खूब सराहना मिली, जबकि रजत मेघनानी ने विजयदान देथा की कहानी का सशक्त वाचन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इस अवसर पर अकादमी की मासिक पत्रिका ‘मधुमती’ के नवीनतम अंक का विमोचन भी किया गया, जिसमें समकालीन रचनाएं और साहित्यिक आलेख शामिल हैं।

अकादमी परिसर में आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी में राजस्थान साहित्य अकादमी के प्रकाशनों के साथ-साथ अखिल भारतीय साहित्य परिषद की महानगर इकाई की पुस्तकों ने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। इसके अलावा हेमंत जोशी, अनायास आर्ट एक्सप्रेशन के शैलेंद्र शर्मा, निलोफर मुनीर, रुचि सुखवाल और स्केच आर्टिस्ट राहुल माली की कला प्रस्तुतियों एवं प्रदर्शनी ने दर्शकों को खासा प्रभावित किया।