शहर का अनसुलझा सवाल: किराया, मकान मालिक और रुकता हुआ विकास”

The biggest obstacle to Udaipur's development: Not rent disputes, but the breakdown of trust.

शहर का अनसुलझा सवाल: किराया, मकान मालिक और रुकता हुआ विकास”

उदयपुर आज स्मार्ट सिटी बनने की राह पर है।

नई सड़कें, नई योजनाएं, नई इमारतें और विकास के बड़े-बड़े दावे।

लेकिन इसी विकास यात्रा में एक अदृश्य दीवार है,

जो न तो नक्शों में दिखती है

और न ही सरकारी प्रस्तुतियों में—

पर जो उदयपुर की रफ्तार को भीतर ही भीतर रोक रही है।

यह दीवार है —

किराए और भूमि अधिकारों का अनसुलझा संकट।

जब विकास जमीन पर अटक जाता है

उदयपुर की ओल्ड सिटी और पारंपरिक इलाकों में आज स्थिति यह है कि—

सैकड़ों भवन पुनर्विकास के लिए तैयार नहीं हो पा रहे

सड़क चौड़ीकरण, सीवरेज, स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर अटक रहा है

युवा पीढ़ी को न दुकान मिल रही है, न रोजगार की जगह

और मकान मालिक अपनी ही संपत्ति का उपयोग नहीं कर पा रहे

यह सब इसलिए नहीं कि जमीन नहीं है—

बल्कि इसलिए कि जमीन पर अधिकार को लेकर विवाद है।

दरियादिली से शुरू हुआ संकट

मेवाड़ की पहचान हमेशा से रही है—

शरण देना, सहारा देना, मौका देना।

जो लोग कहीं और से प्रताड़ित होकर आए,

जिनके पास रहने और कमाने की जगह नहीं थी,

उन्हें यहां—

मकान किराए पर मिले

दुकानें खोलने की जगह मिली

गोदाम, कार्यस्थल, छत मिली

यह सब कानून से पहले इंसानियत के आधार पर हुआ।

लेकिन समय के साथ,

यही दरियादिली आज विकास में सबसे बड़ी बाधा बनती जा रही है।

आज समस्या किराए की नहीं, अधिकार की है

आज उदयपुर में बड़ी संख्या में ऐसे मामले हैं जहां—

किराएदार वर्षों से जमे हुए हैं

भवन मालिक कानूनी लड़ाई में फंसे हैं

न भवन खाली हो रहा है

न मालिक अपनी अगली पीढ़ी को वहां स्थापित कर पा रहा है

परिणाम यह है कि—

➡ भवन जर्जर हो रहे हैं

➡ बाजार ठहरे हुए हैं

➡ निवेश रुक रहा है

➡ और स्मार्ट सिटी सिर्फ कागज़ों में आगे बढ़ रही है

30–40% ओल्ड सिटी क्यों विकास से कट गई है?

यह आंकड़ा डराने वाला है।

उदयपुर की ओल्ड सिटी का बड़ा हिस्सा—

न रिडेवलप हो पा रहा है

न मॉडर्नाइज

न सुरक्षित

क्योंकि हर पांचवें भवन के साथ

किराया या कब्ज़े का विवाद जुड़ा है।

जब तक यह सुलझेगा नहीं,

उदयपुर का विकास अधूरा ही रहेगा।

**जिन्होंने मेवाड़ के लिए संघर्ष किया—

आज वे कागज़ लेकर अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं**

यह विडंबना नहीं तो क्या है कि—

जिनके बाप-दादाओं ने मेवाड़ की रक्षा की

आज वही लोग अपनी जमीन के कागज़ लेकर

कोर्ट, दफ्तर और प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं

यह सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा नहीं,

यह सामाजिक और शहरी संकट है।

यह मुद्दा किराएदार बनाम मालिक नहीं है

यह लेख किसी के खिलाफ नहीं है।

“अगर इंसानियत और कानून के बीच संतुलन नहीं बना,

तो विकास सबसे पहले मरता है।”

किराएदार सुरक्षित रहें—यह ज़रूरी है।

लेकिन मालिक बेघर और बेबस न बनें—यह उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।

अगर उदयपुर को सच में स्मार्ट बनाना है

तो अब—

किराया कानूनों की स्थानीय समीक्षा हो

ओल्ड सिटी के लिए विशेष समाधान नीति बने

मालिक और किराएदार दोनों के लिए समयबद्ध समाधान हो

और इंसानियत को कब्ज़े का हथियार न बनने दिया जाए

अंत में

उदयपुर का विकास

सिर्फ नई इमारतों से नहीं होगा,

बल्कि पुराने घावों को भरने से होगा।

मेवाड़ ने कभी दरवाज़े बंद नहीं किए।

अब ज़रूरत है कि

मेवाड़ के विकास के रास्ते खोले जाएं।

“यह भी उतना ही सच है कि किराएदारों को कानून ने सुरक्षा दी है,
क्योंकि बेघर होना किसी भी परिवार के लिए संकट है।
लेकिन जब यही सुरक्षा वर्षों तक किसी समाधान के बिना जमी रहती है,
तो वह सुरक्षा नहीं, शहरी विकास के लिए जड़ता बन जाती है।”